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Thursday, August 13, 2015

एक मुसाफिर

एक मुसाफिर वक्त से आगे निकलकर जी गया
वक्त बेदर्दी से आखिर काम उसका कर गया । 
 
हम नही रोयेंगे ये वादा किया था आज लेकिन
आसमाँ शामिल न था इसमे,  बिचारा रो गया ।
वक्त बेदर्दी से आखिर काम उसका कर गया ।

संगदिलोमे आपका चलता रहेगा कारवाँ
एक सूरज आज बस यूँ मुस्कुराहते ढल गया ।
वक्त बेदर्दी से आखिर काम उसका कर गया ।

---आदित्य 

Wednesday, February 11, 2015

झूम उठेगी शराब


हाथ लगाके देखो तुम इन प्यालोंको ये बह जाएंगे
झूम उठेगी शराब के अब होंठ आपके छू जाएंगे

नजरोंसे ही नशा दिला दो, जी जाएंगे उम्र हमारी
नजरोंसे ही जहर पिला दो, खुशी खुशी से मर जाएंगे

ख्वाब देखके रातोंको हम दिल को ये समझाते है
ख्वाबही सही, रूबरू कही, आप सामने आ जाएंगे

रिश्तोकी रंजिश मे और दुनिया की गर्दिश मे आखिर
हमे आजमाकर तो देखो, रूह छोडके आ जाएंगे

यही तमन्ना है के निकले जान आपके पहलुमे ही
इसी बहाने आसू मेरी प्रेम कहानी कह  जाएंगे

-- आदित्य

Monday, November 24, 2014

तेरे नैना

तेरे नैना छुप छुप के
जो बातें मुझसे करते हैं
छू जाती हैं दिल को लेकिन
होंठ सिले ही रहते हैं

इन आंखोकी गहराईमे
गिर जाए ना चाँद कहीं
झील के किनारोंपे देखो
तारे पहरा करते हैं

खो जाता हूं कहीं न जाने
नीली नीली झील जानने
अनजाने खाबोंके रस्ते
वहीं कहींसे गुजरते हैं

याद है मुझे शाम सुहानी
आसमानसे शरमाती थी
उसी शाम के रंग सिमटकर
जजबातोंको संवरते  हैं

कह भी दो अब आँखोसे तुम
हाँ या ना जो भी सो हो
दीदार आपका  हो जाए,
बस यही तमन्ना करते हैं


---आदित्य


 

Friday, October 31, 2014

परछाई

परछाईयों से डरता हूँ
पर उनकेही संग रहता हूँ
कभी दूरसे कभी पासमे
उनकेही संग चलता हूँ

डर जाती है अंधेरेमे
परछाई, और छुप जाती है
दिया जलाके रिश्ता अपना
और उजागर करता हूँ

शाम डूबती परछाईको
ले जाएगी दूर जहां में
वही कही वो बस जाती है
मैं एक तनहा सो जाता हूँ

सूरज की परछाई भी
खो जाती है किसी शहर में
सूरज बन के उस सूरज को
कुछ परछाई दे देता हूँ

-- आदित्य 

Tuesday, March 26, 2013

खबर

आज उनकी खबर ने जिंदा किया हमे
यादोंकी  गहराई में दफना  दिया हमें

कुछ तो सुकून मिला एक पलभरही सही
पलभर की ही बारिश ने गीला किया हमें

नहीं समझा सके इन आंखोकी नमी को
यही कहा दिल ने 'क्यों रुला दिया हमें?'

सहमेसे इस दिल ने अब पत्थर बनके
गीली गीली यादोंसे बस पर्दा किया हमें

----आदित्य

Wednesday, June 27, 2012

एक ऐसा भी दिन आयेगा

एक ऐसा भी दिन आयेगा
मैं  साथ नहीं रह पाऊंगा
मैं देख सकूंगा  तुझको 
लेकिन साथ नहीं दे पाऊंगा
एक ऐसा भी दिन आयेगा

एक ऐसा भी दिन आयेगा
दो आंसू  होंगे आंखोंमे
फिसल गिरेंगे गालोंपरसे
मोती बनके हाथोंमे
एक ऐसा भी दिन आयेगा

एक ऐसा भी दिन आयेगा
सब  मिट्टीमें मिल जायेगा
फिर उभरेगा जो पौधा
वो आसमान छू जायेगा
एक ऐसा भी दिन आयेगा

एक ऐसा भी दिन आयेगा
जब आँखे अपनी बंद करोगे
मन की आँखे धुल जायेगी
जग उजियारा दिखलायेगा
एक ऐसा भी दिन आयेगा

एक ऐसा भी दिन आयेगा
हम सूरज खुदका बन जायेंगे
रोशन होंगी मंजिल अपनी
और अंधेरा मिट जायेगा
एक ऐसा भी दिन आयेगा

एक ऐसा भी दिन आयेगा
हम और नहीं गिर पायेंगे
फैलाके पंखोंको अपने
उडनाही रह जायेगा
एक ऐसा भी दिन आयेगा 
 
आदित्य 

Monday, June 25, 2012

मैं रंग चुरालूं पानीका

काली बदरा जल बरसाये
बूंदोके त्योहार सजाये
इस सावन भरी कहानीका
मैं रंग चुरालूं पानीका

मन मतवाला महक उठा है
पंछी बनके चहक उठा है
गीली खुशबू और सुरोंमें
रंग भिगौके झूम उठा है

अब रंग कहां? ये ढंग बना
जिस हाथ लगा, वो संग बना
इस सावन भरी रवानी का
मैं रंग चुरालूं पानीका\


आदित्य  


 

फूल खिला है आंगन में

कोयल कूक लगायेगी और
तितली भी मंडरायेगी
फूल खिला है आंगन में
हर सांस महकसी जायेगी

हर सावन पिछला रुखा था
कुछ गीला था कुछ सूखा था
अब बारिश ऐसे आयेगी
बस खुशियाँही बरसायेगी

बूंद बूंदसे गीत गिरेगा
गीत गीत से मन झूमेगा
प्यारी बतिया लोरी बनके
किन सपनोंमें खो जायेंगी

चांद सितारे रातोंको
एक नयी कहानी लायेंगे
नन्ही कोमल एक परी
मीठीसी गुनगुन गायेगी

प्यार भरी बूंदोंकी झालर
गालोंपरसे आ फिसलेगी
नन्ही नाजुक एक कली जब
पंखुडीयोंको फैलायेगी

आदित्य

Tuesday, May 17, 2011

याद

एक ही चेहरा हमें बस याद आये
दर्द का एहसास जब भी याद आये

भीतरी कोनेसे उठकर रो पडा गम
आँसुओ में मुस्कुराना याद आये

ढूंढ के हम थक गए दिल को हमारे
प्यार का उठता जनाज़ा याद आये

भूलके भी रात को सोते नहीं जब
ख्व़ाब को दिल से मिटाना याद आये

तरसा किये थे आपके दीदार को हम
यादको ही याद करना याद आये 

---आदित्य देवधर 

Thursday, April 7, 2011

आपसे रुसवा न हमको कीजिये

जिंदगीभर दिल दुखाया है तुम्हारा
एक बस मौका हमें अब दीजिये
आपसे रुसवा न हमको कीजिये

रूठकर यूं छोड़के जाओ न हमको
जिंदगी से तोड़के जाओ न हमको
क्या करेंगे हम तेरे बिन, सोचिये
आपसे रुसवा न हमको कीजिये

क्या कहूं मजबूर था मैं इस कदर के
कह न पाया राज-ए दिल का चाहकरके
दर्द ए दिल कि ये जुबाँ सुन लीजिये
आपसे रुसवा न हमको कीजिये

आँख यादोंसे मेरी ऐसे भरी है
रात आंखोसे उतर ऐसी जली है
आगोश में अपने हमें बस लीजिए
आपसे रुसवा न हमको कीजिये 

-----आदित्य देवधर

Wednesday, April 6, 2011

मेरा मन

क्यूं नहीं लागे मेरा मन
क्यूं कहीं भागे मेरा मन
देखलो शायद वहीं पे
आह भरता हो मेरा मन

उड़ चले वो चाँद छूने
चांदनी की सेज बुनने
सो वहीं जाए अकेले
देखके सपने मेरा मन

एक बर्फीले जहां में
धुंद गीले आसमाँ में
बादलों में घर बनाके
बूंद बन जाये मेरा मन

एक तितली बनके आये
आप, और बस चल दिए
दो घड़ी रुकते ज़रा और
ले चले जाते  मेरा मन 


---------आदित्य देवधर 

Monday, March 28, 2011

उम्मीद

मंजिलें लुटती गयीं और
फासलें भी बढ गए
चुटकीसी उम्मीद लेके
हौसलें फिर बन गए

शाख से पत्ते गिरे और
आँख से मोती गिरे
कुछ वहा मिट्टी बने और
कुछ बहारे बन गए

सह लिए हैं जुल्म इतने
बस तुम्हारी चाह में
दर्द से ऐसे जुड़े
हम-दर्द तेरे बन गए

ये कहाँकी बाढ़ है
जो ले न जाए कुछ कहीं
तेज ऐसी धार में बस
गम पुराने धुल गए

---- आदित्य देवधर 

जिंदगी

धूप में जलती जलाती और रुलाती जिंदगी
शाम को पलकोंके नीचे मुस्कुराती जिंदगी

दर्द में भीगी हुई बाती चिरागों में जले
इस बुझीसी जिंदगी को ही बुझाती जिंदगी  

रो रहा हो आसमाँ तब, जी उठे सारा जहां
बारिशों की धार में रोती भिगोती जिंदगी

एक ऐसा दिन भी आए जो जिए सालों कईं
एक ऐसी जिंदगी से दिल लगाती जिंदगी

रोशनी की ले सवारी, चल पडी जाने कहाँ
बंद मुठ्ठी से निकलके सांस लेती जिंदगी

---आदित्य

Friday, March 25, 2011

क्यूं चाहता है मन मेरा

क्यूं चाहता है मन मेरा
तितली बने, उड़के चले वो
बादलोंको चूमने और
भीग जाए मन मेरा
क्यूं चाहता है मन मेरा

सात रंगों में समाके
रंग की दुनिया बनाके
ले चले अपने परोंपे
रंग जान-ए  मन मेरा
क्यूं चाहता है मन मेरा

रोशनी की झील में, हर
शाम को डुबकी लगाके
बूँद किरनोंकी पिलाके
डूब जाए मन मेरा
क्यूं चाहता है मन मेरा

ले चला मैं रात के
रंगीन सितारे टिमटिमाते
बादलोंसे दूर, दुनिया
को बसाए मन मेरा
क्यूं चाहता है मन मेरा

-------आदित्य देवधर 


Wednesday, May 26, 2010

तेरे नज़ारे की

हमें उम्मीद न थी तेरे नज़ारे की
क़यामत दीवानी थी तेरे नज़ारे की

गुजरा करे गलीसे तेरी ए हुस्न वाले
बुझा दो प्यास हमारी तेरे नज़ारे की

बेताब दिल की जुबाँ कैसे बयाँ करू मैं
एक झलक तो पिला दो तेरे नज़ारे की

एक बार मुस्कुराके देखो ज़रा इधर भी 
गीली हसीं बरसा दो  तेरे नज़ारे की

लो चले हम उठकर दुनियासे तुम्हारी
तमन्ना बंद आँखों में तेरे नज़ारे की

पाँव मेरे लडखडाये कभी राह चलते
यादे मिली पुरानी तेरे नज़ारे की

------आदित्य

Saturday, September 19, 2009

कमरा

यादे बंद कमरे में रखने की आदत है तुम्हे
कमरा बंद रखते हो पर चाबी खोने का गम नही
कोई झाँक कर देखे भी तो क्या देखे टूटी खिड़की से ,
अंधेरेसे गीली हुई जमीन और दीवारों पर नम कहीं

रौशन लकीरें तरस गयी है भीतर आने कों
खिड़की को भी साँस लेने दो कभी यूँही
ये सोई हुई यादें ताजा होने का डर है तुम्हें
और यादोंकों छुपना है सोये अन्धेरोमे कहीं.

अब यादोंको उजाला मिल भी जाए तो क्या हो
ये रोशन यादे जुगनू बनके उड़ने वाली नहीं
दीवारोंपे रंग भी लग जाए तो क्या हो
कमरे में बसी तस्वीर हटने वाली नही



--------------आदित्य देवधर